Chhath Puja During Pregnancy: छठ पूजा में 36 घंटे का निर्जला उपवास रखा जाता है, जो बेहद कठिन माना जाता है। गर्भवती महिलाओं के लिए यह व्रत स्वास्थ्य के लिहाज से नुकसानदायक हो सकता है। हालांकि, अगर कोई महिला इस दौरान पूजा करना चाहती है, तो डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। जानिए सुरक्षित रूप से छठ पूजा कैसे करें

Chhath Puja During Pregnancy: छठ पूजा आस्था और सूर्य उपासना का महापर्व है। यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है, जिसमें कार्तिक महीने का छठ सबसे प्रमुख माना जाता है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया की संयुक्त उपासना को समर्पित है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में श्रद्धालु निर्जला उपवास रखते हैं।
छठ पूजा के दौरान भगवान सूर्य तथा छठ मइया की आराधना करते हैं। लेकिन कई महिलाओं के मन में यह सवाल होगा कि गर्भावस्था में छठ पूजा या व्रत रखना सुरक्षित है या नहीं। अगर आप भी प्रेगनेंट हैं और छठ पूजा का व्रत रखने का सोच रही हैं, तो जानिए गर्भावस्था में छठ पूजा व्रत के नियम क्या है।
क्या व्रत रखना सुरक्षित है?
गर्भवती महिलाओं के लिए लंबा निर्जला व्रत रखना चिकित्सकीय रूप से सही नहीं माना जाता। इस दौरान शरीर को पर्याप्त पानी और पोषण की आवश्यकता होती है। निर्जला व्रत से डिहाइड्रेशन, कमजोरी या बेहोशी जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जो मां और बच्चे दोनों की सेहत को प्रभावित कर सकती हैं।
अगर श्रद्धा है तो ऐसे करें पूजा
अगर कोई गर्भवती महिला छठ पूजा करना चाहती है, तो डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। निर्जला व्रत की जगह हल्का फलाहार अपनाया जा सकता है। नारियल पानी, दूध, फल, या साबूदाना जैसे आहार शरीर को ऊर्जा देते हैं और व्रत की भावना भी पूरी करते हैं।
पूजा के दौरान सावधानियां बरतें
गर्भवती महिलाएं लंबे समय तक पानी में खड़े रहने से बचें। संध्या अर्घ्य और प्रातः अर्घ्य के समय कुछ मिनटों के लिए जल में खड़े होकर पूजा की जा सकती है। परिवार के सदस्य पूजा की तैयारी और प्रसाद बनाने में सहयोग करें। यदि थकान या असुविधा महसूस हो, तो छठ मइया के भजन सुनें या मन ही मन प्रार्थना करें।
छठ पूजा के प्रति श्रद्धा रखना सराहनीय है, लेकिन गर्भावस्था के दौरान सेहत सबसे पहले है। पूर्ण निर्जला व्रत रखने से बेहतर है कि महिलाएं फलाहार व्रत करें और पर्याप्त तरल पदार्थ लें। इससे आस्था भी बनी रहती है और मां-बच्चे की सेहत पर कोई खतरा नहीं आता।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।